चीन नहीं बनाने देगा भारत को दवाई क्यों?

हेलो दोस्तों तो कैसे हैं आप उम्मीद करता हूं बढ़िया होंगे फिट होंगे होंगे स्वस्थ होंगे और भगवान ऐसे ही आपके
परिवार और आप पर कृपा बनाए रखें तो आज का मुद्दा हमारा यह है कि
चीन भारत को हाइड्रोक्लोरिक दवाई बनाने नहीं देगा क्यों?

चीन भारत को दवाई नहीं बनाने देगा

हेल्लो दोस्तों वेलकम टू माय ब्लॉग शॉकिंग न्यूज़ आज मैं गौरव अरोड़ा आप सबके सामने अपने विचार रखने जा रहा हूं।


दुनिया में करीब 30 देश हाइड्रोक्लोरिक दवा लेने के लिए भारत के सामने लाइन लगाकर खड़े हैं।

इन देशों ने दुनिया में सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका भी है।
जिस ने भारत को महाशक्ति बना दिया। जो हाइड्रोक्लोरिक दवा के उत्पादन में भारत सबसे नंबर वन है।

भारत ने पिछले साल 100 करोड़ कमाई करी थी इंपोर्ट करी थी। भारत इतनी उत्पादन क्षमता है कि वह 100 टन हाइड्रोक्लोरिक बना सकता है।

पिछले साल भारत ने करीब 201 देशों को हाइड्रोक्लोरिक दवा एक्सपोर्ट करी थी और इससे अरबों रुपए कमाया था।
लेकिन आज भी इन दवाइयों को बनाने के लिए भारत को चीन पर निर्भर होना पड़ता है।
और दवाइयों को प्रोडक्शन करने के लिए चीन एपीएन इंपोर्ट करता है।


यह दवाइयां बनाने के लिए कच्चा माल होता है। चीन में कोरोनावायरस की वजह से इंपोर्ट और एक्सपोर्ट बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
 चीन का इंपोर्ट भारत में ना होने से कई कंपनियां भारत की उनको दवा बनाने में दिक्कत आ रही है।
जिसका असर दवाइयों कोकी कीमत पर दिख सकता है। भारत सरकार की ओर से मान्यता प्राप्त टीपीसीआ (trade प्रमोशनल colony of India)

की रिपोर्ट के मुताबिक 2018 और 2019 में भारत के एक्सपोर्ट 14 अरब डॉलर की थी। इन दवाओं को बनवाने के लिए करीब 65% एनपी चाइना से इंपोर्ट कराया जाता है।

भारत  मैं एपीएन प्रोडक्ट काफी कम है फाइनल प्रोडक्ट बनने के लिए कुछ चीजें चीन से इंपोर्ट कराई जाती हैं। कोरोना वायरस की वजह से चीन मैं इंपोर्ट का असर दिखा है। दरअसल कोरोनावायरस कि अभी जांच नहीं हुई है।
 हाइड्रोक्लोरिक दवा का इस्तेमाल covid-19 के मरीज पर करा तो अच्छा रिजल्ट मिला।

हाइड्रोक्लोरिक दवा से भारत के मरीज ठीक हो रहे हैं। और इस से हाइड्रोक्लोरिक दवा की डिमांड बढ़ गई है ।
 हाइड्रोक्लोरिक दवा का प्रोडक्शन करने वाला भारत ही है।
चीन की सप्लाई बंद होने से भारत मैं दवाई बनाने वाली कंपनी को एपीएन ज्यादा कीमतों पर खरीदना पड़ रहा है।
मुंबई पर स्थित आरती फॉर्म एपीएन इंपोर्ट करते हैं और इसे दवाई बनाने वाली कंपनियों को भेजते हैं।

कंपनी के हेड हेमंत लतिया बताते हैं जींस से जो कच्चा माल आता है वह माला पूरी तरह से बंद है। कब तक आएगा पता नहीं भारत में जो एपीआई भारत जिसकी वजह से चीन पर निर्भर है। इसलिए मैन्युफैक्चरिंग मैं चीन पर निर्भर है। इसलिए हमने जो एपीआई हम जो एपीआई आयत करते हैं उसमें भी कमी होने लगी है।
चीन ने पुराने स्टॉक की कीमत 10 से 15% तक बढ़ा दी है। जो कंपनी चीन से कच्चा माल खरीदी थी वह भारत की निजी कंपनियों को रेट बढ़ाकर बेच रही हैं।

आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि भारत एपीआई क्यों नहीं बनाता


चीन में API भारत के मुकाबले 20 से 30 परसेंट सस्ता है हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब एपीआई को लेकर चिंता जताई हो। इससे पहले 2014 में भी एपीआई को लेकर लोकसभा में भी सवाल जवाब हुए थे।

उस वक्त दोनों देशों के बीच तनाव की वजह से चिंता जताई जा रही थी। कि ज्यादा चीन कच्चा मांग पर रोक लगा सकता है।
लेकिन इस मसले पर बैठक हुई बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी भी थे। इस स्थिति से निपटने के लिए टास्क फोर्स का गठन किया गया । तत्कालीन रसायन मंत्री आनंद कुमार ने कहा आवश्यक दवाई की सूची। इस दवा यहां  भी है की जिन तैयारी कर हम करीब अस्सी से नब्बे परसेंट तक कच्चा माल चाइना से आता है।

चीन में इसका सुझाव दिया कि भारत एपीआई का प्रोडक्शन बढ़ाना होगा। जिससे उसे चीन पर निर्भर नहीं रहना होगा।

प्रोडक्शन में कमी आई है अधिकतर कंपनियां दवाइयों का प्रोडक्शन कम कर रही है। दवाई का स्टॉक पहले से था। उससे अभी काम चल रहा है और जरूरी चीजें और अधिकतर स्टॉक कोई नहीं खरीद रहा है और जिसके कारण डिमांड बढ़ रही है और सप्लाई लिमिटेड है जिससे मांग बढ़ सकती है।

दवाई बनाने वाली कंपनी मैक्स के डायरेक्टर जगदीश दमन कहते हैं करीब 70 % एपीआई चीन से लेता है भारत। इन कंपनियां कैप्सूल बनाती हैं सप्लाई बंद होने से जिन लोगों के पास स्टॉक पहले से रखा है उसे वह ऊंचे दाम में बेच रहे हैं। जो स्टॉक है वह करीब 1 महीने तक चल सकता है अगर इंपोर्ट नहीं खुला तो काफी दिक्कत आ सकती हैं।

वह मानते हैं कि चीन इंपोर्ट बंद होने से उनके कंपनियां दवाई का प्रोडक्शन कम हुआ है और सप्लाई जल्दी शुरू नहीं हुई तो दवाइयों का प्रोडक्शन रुक सकता है।
इसकी वजह से दवाई की कीमत नहीं बढ़ेगी
। लेकिन अगर चीन से दवाई अगर चीन से सप्लाई दो-तीन महीने तक नहीं होती है तो दवाइयों के दाम बढ़ सकते हैं।

दिल्ली दुर्गा ऐसोर्टेड सेक्टर आशीष ग्रोवर बताते हैं की बहुत सी कम कंपनियां  इतना स्टॉक रखती है की। दो या तीन महीने तक कोई दिक्कत नहीं   आ सकती है ।
हाल यह है कि चीन में 1 या 2 महीने के अंदर चीन से एपीआई की सप्लाई आने के चांसेस हैं।

आशीष ग्रोवर कहते हैं की प्रोडक्शन बड़े रहा है लेकिन ए पी आई की कीमत बड़े रही है किसी दवाई की मांग नहीं बड़ी है जिस  से पता चले संकट आ गया है । चीन में कोरोना वायरस जुड़ी दवा यहां से जा नहीं रही है। इसलिए बाकी दवाइयां की कीमतों पर असर नहीं पड़ रहा है।

सरकारी आंकड़े कहते हैं।


P h a r m a c e u t t i c a l s export promotion council of India 2018 to 2019
भारत का दवाई का प्रोडक्शन कुल 19 मिलियन डॉलर था
विश्व संगठन की मांग पर डीपीजी और डीजी के करीब 65% दवाई भारत से बनती है।
और खसरा के 90 percent टीके भारत से तैयार किए जाते हैं।
कोई आज पूरी दुनिया भारत से दवाई की मांग कर रही है। और भारत के पास कोई और ऑप्शन नहीं है।
जेनेरिक दवाई बनाने वाले 20कंपनियों में से आठ कंपनियां भारत की हैं ।भारत से एक्सपोर्ट होने वाली दवाई मैं 55 परसेंट उत्तरी अमेरिका और यूरोप इंपोर्ट करती हैं।

आयात करने वाले देशों में अमेरिका सबसे बड़ा आयातक अफ्रीका के जंगलों के बाजार में भारत की साझेदारी पचास फ़ीसदी है भारत में साल 2018 में दुनिया के 201 देशों में नो 52 करोड़ डॉलर की दवाई निर्यात की चिंता जताई जा रही है कि भारत के साथ दुनिया भर में दवाओं की किल्लत हो सकती है साथ ही भारत की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
लास्ट में यही कहना चाहूंगा घर पर रही है । हाथ बार-बार दोहे ताकि कोरोना वायरस से बच सकें और घर के बाहर ना जाइए अगर जरूरत  ना हो और घर पर ही रहिए।
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धन्यवाद मेरे आर्टिकल को पढ़ने के लिए।
जय हिंद जय भारत।

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