Speak up India स्पीक अप इंडिया
हेल्लो दोस्तो मेरा नाम राकेश अरोड़ा और आज मैं आपसे बात करने जा रहा हूं एक चर्चा वाले विषय पर कि क्या कॉलेज के बच्चों को प्रमोट कर देना चाहिए। लेकिन टॉपिक स्टार्ट करने से पहले अगर आपने हमारे शॉकिंग न्यूज़ ब्लॉक को सब्सक्राइब नहीं किया है तो सब करें ले। और अगर आपको आर्टिकल अच्छा लगे तो शेयर करें फेसबुक व्हाट्सएप इंस्टाग्राम और इंटरेस्ट में और ट्विटर पर।
बिना किसी देरी के तो शुरू करते हैं।
स्पीक उप इंडिया
आज आज देश में कोरोना वायरस जैसी महामारी बहुत ज्यादा लोगों को प्रभावित कर रही है।
लोकडॉन से पहले वह दुकान है जहां लोगों की भीड़ जमा हो जाया करती थी और वह रोड जहां दिनभर ट्रैफिक जाम लगा रहता था आज वही रोड पर गाड़ियां ना तो चल रही हैं और ना ही लोग चल रहे हैं ।जिस दुकान पर भीड़ लगी रहती थी वह दुकान पर आज गिने-चुने लोग ही आ रहे हैं।
कभी कभी मैं सोचता हूं कि हम मिडिल क्लास और व्हिच क्लास वाले लोग कितने खुद खुश नसीब और भाग्यशाली कि उन्हें रहने को छत और खाने को मिल रहा है।
लेकिन इस लोक डाउन की वजह से ना जाने कितने लोग बेरोजगार हो गए और कितनों की नौकरी चले गई और कितने लोगों को खाने तक के पैसे भी नहीं है । अब उनका क्या होगा लेकिन इस बीच जो सबसे ज्यादा लोग प्रभावित हुए हैं वह है हमारे देश के सम्मान देश की शान लेबर जिन्हें हम कहते हैं मजदूर।
इस लॉक डाउन के चलते कितने लेबर लोगों का रोजगार छिन गया। और रोज रोज अखबार में नई नई खबर आती है कभी इसी जगह पर लेबर ट्रेन के नीचे सोता हुआ कट जाता है ।तो कभी कोई लेबर कहीं जान दे देता है ऐसी दुख भरी खबर सुनकर अखबार में पढ़ कर मन बहुत भारी सा हो जाता है ।और गुस्सा आता है अपनी सरकार और अपने देश के नागरिकों पर कि वह 10 या ₹20 पीएम के फंड में नहीं डाल सकते।
जिससे बेबस होकर लेबर लोग अपनी कहानी फेसबुक के द्वारा पोस्ट करते हैं ताकि उनकी कोई मदद कर सके लेकिन उसमें भी मदद कुछ ही लोगों की हो पाती है।
लोक डाउन की वजह से कितने लोग पैदल चलकर अपने घर जा रहे हैं कोई हजार किलोमीटर नाप रहा है तो कोई 100 किलोमीटर तक नाप दे रहा है।
ज्यादातर लेबरों के पास पहनने को चप्पल तक नहीं होती है और खाने के पैसे भी नहीं होते हैं और जो बचे कुछ लोग जो अपने घर पहुंच जाते हैं लेकिन वहां जाने के बाद उनके जेब में एक पैसा नहीं होता जिसे अपने परिवार को दो रोटी खिला सके।
पैदल चलने के कारण कई लोग रास्ते में मर भी गए हैं जिसके मामले सामने आए हैं। एक मामला ऐसा भी आया था कि जब एक लेबर मां अपने बच्चे को सुलाने के लिए खाने के बर्तन में पानी डाल कर दो पत्थर उबाल दें ताकि उसके बच्चे खाना पकने के इंतजार में सो जाएं । आप सोच सकते हैं उस मां पर क्या बीत रही होगी उस्मा के पास इतने पैसे भी नहीं है कि वह अपने बच्चों को दो रोटी दिन का खिला सके।
मान लीजिए इस भीषण गर्मी में और जब लू का टाइम चल रहा हो और अगर आपसे कह दिया जाए कि इस भीषण गर्मी में आपको रोड में नंगे पांव चलना है।
तो अगर आपने थोड़ा सा भी रोड में चलने की कोशिश करें तो आपके पांव में एक दम से जल जैसे हो जाएंगे और तापमान कितना ज्यादा होता है कि कई लोगों के उसमें आंसू निकल जाते हैं ।तो सोचिए जब हम सिर्फ इतना ही चलने में हमें इतना दर्द हो रहा है।
तो एक बेचारा बेबस लेबर जब हजार किलोमीटर नंगे पांव चल चले जा रहा है तो उसको दर्द नहीं होता होगा। और उनके पास ना तो पीने का पानी भी नहीं जिससे वह अपनी प्यास बुझा सके।
हमारी देश की सरकार को सिर्फ मुंह से बोलना आता है और बड़े बड़े वादे करने आते हैं और जब उन्हें अमल करने की बात आती है तो वह एकदम गायब ही हो जाते हैं।
हमारी देश की सरकार को बॉलीवुड अभिनेता सोनू सूद से सीखना चाहिए जिन्होंने इतने लेबरों को घर पहुंचाया वह भी अपने दम पर पहुंचाया ।बाकी लोग अपने घर मे बैठकर इंस्टाग्राम पर चैलेंज इस डाल रहे हैं टिक टॉक बना रहे हैं और उन्हें इन बेबस मजदूरों की चिंता नहीं पड़ी है।
और कुछ स्टार जिनको हमारी जनता ने बहुत ज्यादा प्यार दिया ह वह साल मैं करोड़ों की कमाई करते हैं लेकिन जब बारी देश की आती है तो वह बहुत ही कम राशि देते हैं।
आजकल आपने देखा होगा की पॉलिटिक्स लीडर हमारे चहेते सेलिब्रिटी लोग या न्यूज़ रिपोर्टर या कोई भी सोशल मीडिया यूट्यूब वीडियो में हर कोई स्माइल देते हुए बोल रहा है कि घर पर रहिए हम यह जंग जीत सकते हैं स्टे होम स्टे से लेकिन मैं उनसे यह पूछना चाहता हूं कि। यह बात उन पर अच्छी बैठती है जो मिडिल क्लास और व्हिच फैमिली के लिए बढ़िया है।
लेकिन उन लोगों के लिए दिक्कत है जो ऑटो वाले और लेबर लोग जिनके घर में दो रोटी खाने को नहीं तक के पैसे नहीं है। वह बेचारा लोग डाउन क्या समझेगा लॉन्ग डॉन का क्या पालन करेगा।
लेकिन इस बीच बड़े-बड़े नेता और लोग सरकार से कह रहे हैं कि मजदूर को 10000 उनके खाते में 5 महीने के लिए। बेरोजगार के खाते में 5000 3 महीने के लिए और अंधे और दिव्य के लिए 6000 3 महीने के लिए।
लेकिन हम सरकार को दोष दे रहे हैं कि सरकार लेबरों की मदद नहीं कर रहे हैं मुझे आप बताइए जो कोरोना वायरस के मरीज हैं जिनको 14 दिनों के क्वॉर्टिने लिए कर रखा है ।उनका खाने उनके रहने और बाकी सब ट्रेनों का खर्चा बसों का खर्चा बहुत सारे खर्चे सरकार खुद उठा रहे हैं।
लेकिन सरकार को दोष देने से पहले हम यह सब खुद कर सकते हैं अगर हम एक इंसान ₹10 किसी पांडे या आपके आसपास कोई भी ऐसी संस्था हो जो गरीब हो या की जानवरों की मदद करती हैं 10 या बीज ₹20 का कॉन्ट्रिब्यूशन पर व्यक्ति 10 या 20 तो हम इस कोरोना वायरस की जंग में अपने लेबर और अपने जानवरों को बचा सकेंगे।
हम 10 ₹20 का कुरकुरा या कई लोग सिगरेट बीड़ी और बाकी फालतू चीजों में खर्च करते हैं जिसका हमारे जीवन से कोई मोल नहीं रखता है अगर हम सिर्फ 10 या ₹20 ही दें तो हम बहुत कुछ कर सकते हैं लेकिन हमारी आधी से ज्यादा जनता को इससे क्या फर्क पड़ता है वह तो एसी में सो रहे हैं।
जय हिंद जय भारत।
धन्यवाद।













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